Saturday, April 7, 2012

स्वर्ण मंदिर की पहली झलक...


अभी हाल ही में दोस्तों के साथ स्वर्ण मंदिर जाने का मौका मिला... रात के करीब ११ बजे हम पहली बार मंदिर पहुंचे, हम सब उस नज़ारे को निहार रहें थे... सब शांत थे.... सभी के मन में कई भावनाएं थीं... उस वक़्त मेरे ज़ेहन में कुछ पंक्तियाँ आई... जो मैंने लिखी है... ये उन पलों के लिए है जो उस समय मैंने बिताये.. और उन दोस्तों के लिए जो उन पलों के गवाह बने.... शुक्रिया- सोम, श्वेता, अंकुला, शांतनु, क्षितिज...

पीली चादर ओढ़े ये लहरें जब हिलती है,
मन की रोशनी के साथ उम्मीदें मिलती है,
मन पानी पर ही दौड़ जाता है, यूँ ही,
करता है सजदा बार-बार,
रब से सारी दूरी मिट जाती है,
हर आहट पर महसूस होती है मौजूदगी उनकी,
दुनिया वहीँ पर सिमट जाती है,
महसूस की है इबादत की सिहरन मैंने,
मेरी रूह तक सिहरी है रब की नजदीकियों से,
खुशनसीबी मेरी कि ऐसा दीदार हुआ,
एक बार नही बार-बार हुआ...
-
शुभी चंचल

Friday, April 6, 2012

परीक्षा... मेरी या बाबा की

आज जब मुड़कर मेरी उंगलियां,
लिखती है कोई लेख, कोई कविता,
मिलती है अक्सर मुझे,
आलोचनाएं और कभी प्रशंसा भी,
पढ़ते है मुझे साथी मेरे, कभी कुछ बड़े भी,
कल यूं ही कलम उठाई मैंने,
मोड़ी अपनी उंगलियां फिर,
अचानक कौंध आई ज़ेहन में,
मेरी उंगलियों के पास एक हथेली,
हथेली थी बाबा की,
हथेलियां जिनमें मेरी उंगलियां समाई थी,
कभी मोड़ कर मेरी तीन उंगलियों को,
सिखाया मुझे लिखना,
जब पहली दफा थाम कर मेरी उंगली,
खिंचाई होगी रेखा एक
और वो रेखा सीधी न होकर, भटकी होगी राह से तब,
बाबा को गुस्सा आया होगा,
मगर फिर से कोशिश की होगी,
मेरे साथ वो भी देते आए होगे परीक्षा मेरी,
आज मेरी लिखावट को पढ़कर,
क्या आता होगा ज़ेहन में बाबा के,
क्या पास कर ली है मैंने परीक्षा अपनी, उनके साथ भी,
या आज भी उन्हें महसूस होती होगी,
कमी अपनी, मेरी तैयारी में...
-शुभी चंचल

Wednesday, April 4, 2012

इम्तियाज़ की नायिका...3


रॉकस्टार

इम्तियाज़ अली की एक खासियत है कि उनकी फिल्मों में नए-पुराने, सही-गलत का द्वंद्व जरुर रहता है। चाहे उनकी फिल्म ‘जब वी मेट’ हो, ‘लव आज कल’ हो या फिर ‘रॉकस्टार’। ‘जब वी मेट’ की नायिका और ‘लव आजकल’ का नायक इसी द्वंद्व से जूझते हैं। यहां रॉकस्टार में फिर नायिका इसी का शिकार होती है और नायक आखिर तक इसी से जूझता दिखता है। गायिकी की ऊंचाईयां छूने की ख्वाहिश में जनार्दन जाखड़ (रणबीर कपूर) दर्द की तलाश में फिरता है और यहीं दर्द उसे आखिर तक रॉकस्टार बनने के बावज़ूद नही छोड़ती। कश्मीरी मूल की हीर (नर्गिस फाकरी) जनार्दन को जॉर्डन बनाती है पर साथ ही उसे तो दर्द में डूबाती ही है खुद भी झुलस जाती है। दोनों का प्यार पनपता है, बिछड़ता है, मिलता है। शुरुआत में जिंदगी को शिद्दत से जीने की तमन्ना रखने वाली हीर गलत-सही के द्वंद्व में फंस जाती है। वह इसी फेर में जॉर्डन को ठुकराती है। जॉर्डन अपना मकसद खो बैठता है, गायिकी में आवारगी मिला देता है। अंदर-अंदर हीर अपने दर्द को झेलने की कोशिश करती है पर हार जाती है। एक बार फिर इम्तियाज़ अली की नायिका को नायक की जरूरत पड़ती है। फिल्म के बाद इम्तियाज़ ने जताना भी चाहा है कि सही-गलत, नियम-कानून के पार भी सोचा जाना चाहिए। जिंदगी को नियमों से बांधना क्या जीने से रोकना नहीं है? और फिर जब ये नायिका पर ज्यादा हावी दिखे। फिल्म में हल्के-फुल्के दृश्यों में भी स्त्री-चेतना के सवाल जो उठाये गए हैं महत्वपूर्ण हैं।

Thursday, March 22, 2012

पिछले छह महीनों में...


पिछले छह महीनों में,
देखा मैंने प्यार, दुलार और एक भार,
प्यार, दुलार जो दिया मुझे,
पर्वत, हवाओं और पत्तियों के जंगल ने,
उगते सूरज की गर्माहट ने,
बढ़ते चाँद की ठंडक ने,
हर पल एक साथ, एक हाथ दोस्ती का,
सिकुड़े हुए कमरे की चार दीवारी ने,
खिड़की पर टंगे और हिलते परदों ने,
भार, भार था बस एक एहसास का,
सिर्फ जिसे लायी थी शहर में,
उम्मीद को पूरा कर पाने का भार,
सपनों को हकीक़त में बदलने का भार,
आज नही है उस भार का एहसास,
मगर है अब एक और ही एहसास,
उस प्यार और दुलार के दूर जाने का,
खुद में घुल चुके है ये पर्वत, हवाएं और जंगल,
वो हाथ दोस्ती का, दीवारे और हिलते हुए परदें,
पिछले छह महीनों में,
पाया मैंने प्यार, दुलार और एक भार...
-शुभी चंचल

Wednesday, March 21, 2012

इम्तियाज़ की नायिका...2


लव आजकल

लव आजकल में इम्तियाज़ अली ने दो पीढ़ी के युवाओं को प्रेम के एक ही स्वरूप में दिखाया है। फर्क सिर्फ इतना है कि नई पीढ़ी इस प्रेम को देर में समझती है या मानती है। फिल्म की नायिका एक आत्मनिर्भर लड़की है जो देश की पुरानी और बेरंगी हो चुकी इमारतों में रंग भरना चाहती है। दोनों पीढि़यों में प्रेम तो एक जैसा ही है मगर दोनों की नायिकाओं में अंतर है। इम्तियाज़ अली ने अपनी फिल्मों में जो नया प्रयोग किया है वो नई पीढ़ी की नायिका में नज़र आता है। नायिका नई सोच की है, उसका दिल जो कहता है, वो सब कुछ करती है। सामाजिक बंदिशों से कोसों दूर है। अपने जीवन के छोटे-बड़े फैसले खुद करती है। चाहे वो किसी अजनबी से दोस्ती करना हो या अपनी नानी की इच्छा के विरूद्ध जाकर अपना करियर चुनना हो। अंदर से वो भले ही आम लड़की है मगर बाहर से वो उन सब से अलग दिखती है। स्वाभाविक भावनाओं से अलग रहने की कोशिश करती हुई नज़र आती है और उन भावनाओं को छिपाने का भरसक प्रयास करती है। नायिका और नायक वास्तविकता को समझते हुए, पूरी योजना के साथ अलग होते हैं और इस समझदारी के लिए एक दूसरे की पीठ थपथपाते हैं। अलग होने के बाद भी अंदर से एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन खुद को अलग साबित करने के लिए एक दूसरे को अपनी भावनाएं नहीं बताते। अचानक दूसरे लड़के से शादी का नाम आते ही नायिका की असहजता साफ नज़र आने लगती है। वहीं पर इम्तियाज़ अली अपने नए प्रयोग में वास्तविकता का छिड़काव करते हैं। नई सोच की नई नायिका एक बार फिर भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण संस्था- विवाह, की रस्मों को लेकर विश्वास से भरपूर दिखती है और उनकी परवाह भी करती है लेकिन फिर जब उसे अपनी जिंदगी नायक के बगैर सोच के सिहरन महसूस होती है तब वो इम्तियाज़ अली की नई सोच की नायिका बनकर उभरती है और अंत सुखद लगता है। इम्तियाज़ अली की यह फिल्म भारतीय समाज में हो रहे धीरे-धीरे बदलाव की अच्छी तस्वीर पेश करती है।

-शुभी चंचल

मेरी सच्चाई...



दिख रही है मुझे मेरी सच्चाई,
मेरी जिंदगी की तरह खाली है मेरा कमरा,
आवाज़ दीवारों से टकराकर आ रही है मेरे पास,
डर नहीं कि कोई समझ लेगा आह मेरी,
ग़म नहीं कि कोई पोछ कर आंसू मेरा कहेगा कि
‘सब ठीक है‘
बल्ब सिर्फ मुझे देखेगा
और हवा पंखे की सिर्फ मेरे बाल उड़ाएगी,
ये डिबिया गुम नहीं होगी कभी,
न ये गिलास कोई उल्टा रखेगा,
कुछ नहीं बिगड़ेगा, कभी नहीं,
मुझे खुश होना चाहिए मगर,
दिख रही है मुझे मेरी सच्चाई।।
-शुभी चंचल

धीरे-धीरे...


जिंदगी रात नहीं जो गुज़र जाएगी,
एक दिन है जो ढल रहा है धीरे-धीरे।

अक्सर मिलकर लोग बिछड़ जाते है,
फिर किसी मोड़ पर नज़र आते है,
याद आती है एक झलक में बीती बातें सारी,
एक चक्र है जो चल रहा है धीरे-धीरे,

रखते है कई चाह, कुछ अलग कर जाने की,
किसी को मिलती है मंजिल, किसी को कसक है न पाने की,
कोई तो आग रहती है हर दिल में,
एक शोला है, जो जल रहा है धीरे-धीरे,

बाद मुद्दतों के नज़र आती है कमी कोई,
आंसू नहीं गिरते मगर रहती है नमी कोई,
जब परदा उठता है सच्चाई से तो मालूम पड़ता है,
ये दोस्त के खोल में छलिया है जो छल रहा है धीरे-धीरे।।

-शुभी चंचल

Tuesday, March 6, 2012

इम्तियाज़ की नायिका...

जब वी मेट.....
जब वी मेट की शुरूआत एक डूब चुके कारोबार के मालिक की बिखरी हुई जिंदगी से होती है। शुरूआत में ही इम्तियाज़ अली समाज की एक रूढि़वादी सोच की छोटी सी झलक पेश कर देते है। आदित्य (शाहिद कपूर) अपनी मां से बेइंतहा नफरत करता है। इस नफरत की वजह है उसकी मां का दूसरे पुरुष से संबंध। हमारे समाज की ये सोच कि एक शादी शुरू औरत जिसका जवान बेटा है वो कैसे किसी और पुरुष से प्रेम कर सकती है? यही सवाल आदित्य को अपनी मां से नफरत करवाता है। इसके बाद फिल्म की नायिका आती है जो आज तक की तथाकथित सुसंस्कृत, बेचारी और कोमल हृदया लड़की से बिल्कुल उलट नज़र आती है। गीत, पंजाब की एक लड़की जो मुंबई में पढ़ाई खत्म करने के बाद अकेली घर वापस जा रही है। इतना ही नहीं वो ट्रेन छूटने से ठीक पहले स्टेशन पहंुचती है और लगभग दौड़ती हुई ट्रेन में चढ़ती है। बिना किसी हिचकिचाहट, डर और असहजता के वो अजनबियों से बात करती है। हमारे समाज में जहां आज भी लड़कियों का अकेले सफर करना, अजनबियों से बात करना, ज्यादा बोलना, मजाक करना सभ्यता के दायरे से बाहर है, वहां गीत एक तेज तर्रार, बात-बात पर ठहाके लगाने वाली, बेहद सकारात्मक और दूसरों की मदद करने वाली लड़की है। यहां तक तो ठीक है मगर इसके बाद इम्तियाज़ अली की कल्पना सामने आने लगती है। आदित्य के एक स्टेशन पर उतर जाने पर गीत भी अपना सामान छोड़कर उसके पीछे ट्रेन से उतर जाती है। अब हां सवाल खड़ा होता है कि क्या हमारे समाज में कोई भी लड़की ऐसा कर सकती है? खैर उसके बाद दोनों की ट्रेन छूट जाती है और गीत को गुस्सा आता है और वो अपना परिचय खुद देती है- ‘छोड़ने वाली नहीं हूं, कोई आउट मत रखना, सिक्खनी हूं मैं भंटिडा की‘। ये संवाद नायिका के आत्मविश्वास को पूरी तरह दर्शकों के सामने लाने के लिए काफी था। किसी तरह दूसरे स्टेशन पर पहुंचना और फिर वहां पानी बेचने वाले से फालतू की बहस से फिर एक बार ट्रेन का छूट जाना, दुकानदार के छेड़ने पर उसे सबक दिखाना, इतना सब कुछ होने के बाद भी डर का नामोनिशान नहीं। इसके बाद स्टेशन मास्टर की मुफ्त की सलाह पर उसे मुंहतोड़ जवाब देना और आखिरकार एक आदमी से बचते हुए फिर नायक के पास पहुंचना। रात में एक होटल पर पहुंचकर, होटल में मैनेजर के रूप में समाज के मज़ाक को न समझते हुए एक बदनाम होटल में रुककर नायक की समस्याओं को सुलझाती है और लगभग पूरी तरह से टूट चुके नायक को आखिरकार मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। कहीं न कहीं एक संदेह दर्शाती है मगर नायक पर विष्वास कर लेती है। बातों ही बातों में एक डायलॉग- मैं अपनी फेवरिट हूं, आम लड़कियों के लिए बहुत कुछ कह जाता है। बीच-बीच में हौसला बढ़ाने वाली बातें करती है- हमें वहीं मिलता है जो हम एक्चुअली में चाहते हैं। जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की नज़र आती है। जब उसे आदित्य की असली पहचान मिलती है तब वो उसे और समझाती है। उसकी मां भी एक औरत है न कि सिर्फ एक बीवी और उसकी मां है। आखिरकार नायक भी इस बात को समझता है। उसके बाद उसका घर पहुंचना, अपने रिश्ते की बात पर नायक की राय लेना, उसके साथ भागना इन सब में नायिका के चरित्र का बेबाकीपन साफ नज़र आता है।
यहां तक इम्तियाज़ अली ने एक अलग तरह की नायिका पेश की है मगर इसके बाद गीत बदल जाती है। जब उसका प्रेमी उसे छोड़ देता है तो गीत भी उन तमाम आम लड़की जैसी बिखर जाती है जैसे हमें और फिल्मों में देखने को मिलती है। वो अपना खुद का चरित्र भूल जाती है और एक बार फिर इस नायिका को नायक ही संभालने आ जाता है। अंततः गीत फिर अपने चरित्र में आती है।
इस फिल्म में इम्तियाज़ अली ने बहुत हद तक नारी का एक अलग चेहरा पेश किया है जो समाज को प्रभावित कर सकता है मगर कहीं न कहीं समाज से प्रभावित भी नज़र आता है।

Sunday, February 26, 2012

अधूरा सा कुछ...



अक्सर अधूरा लगता है मुझे सब कुछ,
ठहाकों की आवाज़ में एक ख़ामोशी रहती है,
अक्सर हंसी में मुझे आंसू दिखते है,
भीड़ में इक चेहरा रहता है सामने मेरे,
पूछता है सवाल मुझसे हर बार एक ही,
कैसे मुस्कुरा सकती हूँ मैं,
गुनगुना कैसे सकती हूँ सुरों को,
जब खुश नहीं वो, खामोश सी है,
चुप सी है इक ज़िन्दगी की हर सरगम जब,
गा सकती हूँ कैसे मैं गीत कोई,
मुझे गुनाह लगता है कभी हँसना भी,
मैं हो जाती हूँ अकेली भीड़ में भी,
नही ढूंढ पाती जब उस चेहरे के सवालों के जवाब,
अक्सर अधूरा लगता है मुझे सब कुछ...
-शुभी चंचल

Friday, February 10, 2012

मिली जुली हलचलें...



एक तरफ बधाईयों का तांता और खुशी से कांपते हुए पैर थे तो दूसरी तरफ सहानुभूति भरे शब्द और रूंधे हुए गले। पूरे आईआईएमसी में एक हलचल सी नज़र आ रही थी। उसे भी चारों तरफ से बधाइयाँ मिल रहीं थीं, आस-पास के लोगों का कहना था कि तुम्हारा तो होना ही था। सीमा को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कई सारी चीजे़ं उसके ज़ेहन में चल रहीं थी। इसी बीच वो कुछ पीछे चली गई थी। अभी कुछ सालों पहले जिस शब्द का मतलब भी नहीं पता था उसे, आज वो शब्द उसके लिए कहा जा रहा था। उसकी बात का जवाब देते हुए लगभग दो साल पहले ही उसके भाई ने कहा था कि जब ’पढ़ते-पढ़ते नौकरी’ लग जाए तो उसे कैम्पस सेलेक्शन कहते हैं। सीमा उस वाकये को याद ही कर रही थी कि अचानक उसकी दोस्त ने उसे गले लगा लिया। उसने शुक्रिया अदा किया और चली गई। उसके ज़ेहन में उसकी हर वो छोटी-बड़ी कामयाबी और नाकामयाबी कौंध रही थी जो उसने अब तक पायी थी। हर किसी को उसकी ये सफलता साफ दिखाई पड़ रही थी मगर उसके मन में उठने वाले सवाल को कुछ ही समझ पा रहे थे। उसका मन उन लोगों की तरफ भाग रहा था जिन्होंने उसे इसे मुकाम पर पहुंचने में अपना बहुत कुछ दिया। शायद उसे अभी किसी और खुशी के इंतज़ार के साथ ये समझने में वक्त लगेगा कि आखिर हुआ क्या है.....



-शुभी चंचल

Sunday, January 22, 2012

न जाने किसके लिए...


मां को याद आता होगा अक्सर,

कि, मैं इस वक्त तक भूखा हो जाता था,

कौर वो भी न तोड़ पाती होगी,

जब रसोई में वो छोटी थाली दिखती होगी,

अक्सर मेरी पुरानी कमीज में ढ़ूढती होगी मेरा बचपन,

जो अब भी उसने लोहे वाले पुराने बक्से में रखी है,

बगल वाला भोलू जब भी अपनी मां को पुकारता होगा,

वो भी एक बार मुड़ तो जाती होगी,

दुआ तो देती होगी कि बन जाऊं अफसर मैं,

मगर घर लौटने का रस्ता भी तकती होगी,

कहां अलग हूं मैं भी मां से, मगर कह नहीं सकता,

बस उलझा हूं झूठे कागज़ों को जोड़ने में,

न जाने किसके लिए...

-शुभी चंचल

Monday, January 16, 2012

चुनाव: ज़िन्दगी या पार्टी का...


लगभग चार महीने पहले शीलदास के इकलौते जवान बेटे की मौत हो गयी, पटरंगा वाले कालीचरण के खेतों में पिछली गर्मी में आग लगी थी, कविता तो पिछले आठ महीनों से खुद को समेटने में लगी है जबसे उसका पति उसे इस दुनिया में अकेला, बिखरता छोड़ गया.... नहीं ये किसी एक परिवार की कहानी नही है, ये उत्तर प्रदेश के अलग अलग गाँव के अलग अलग परिवारों की दशा है जहाँ जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले है। खैर सभी पार्टियाँ कुर्सी की जद्दोजहद में बहुत व्यस्त है। किसी को अपनी मूर्तियाँ ढ़कने का गुस्सा है तो कोई अपनी पार्टी में शामिल हुए दागदार लोगों को सही साबित करने में लगा है. चुनाव आयोग के तय किये निर्देशों को कैसे तोड़ा मरोड़ा जाए ये भी एक बड़ा काम है. अपने किये कर्मों को बोरी में बंद करके दूसरों के कामों की गठरी की गाठ खोलना भी कोई आसान काम नही. अब इतने बड़े कामों को करने वालों को शीलदास, कालीचरण और कविता के लिए समय कहाँ है... और वो समय निकालकर करे भी तो क्या॥ ये सिर्फ इन तीनों का रोना होता तो कोई जाकर उनके यहाँ खाना खा आता और कोई उन्हें एक लाख का मुआवज़ा भी दे देता लेकिन ये तो कई गाँव के कई घरों की कहानी है. करे भी तो करे क्या?एक सवाल है जो बार बार मन में आ रहा है कि कालीचरण के भूखे बच्चों के पेट की आग क्या नयी सरकार बुझा पायेगी? शीलदास किस मन से जायेगा किसी पार्टी का चुनाव करने? और कविता उसकी तो सारी उम्र खडी है सामने॥ कई चुनाव करने है उसे खुद के लिए...
इन जैसी जिंदगियों के लिए क्या चुनना ज़रूरी है ये भी एक सवाल है.. अगर ये भी उन आम आदमी में आते है जो लोकतान्त्रिक समाज में खुद अपनी सरकार चुनते है तो किस मनोदशा से ये चुनाव में भाग लेंगे. लोकतंत्र के लिए चुनाव ज़रूरी है मगर जब इनका ख्याल आता है तो सारा जोश ठंडा हो जाता है. खैर हमें तो चुनना ही होगा किसी 'काने राजा' को...

माँ...


पसीने से भीगा हुआ चेहरा याद आता है,
रोटी को जिद से गोल करती उँगलियाँ,
छौंक के धुंए से छिड़ी हुई खांसी,
दाल में नमक के स्वाद की चिंता,
सर्दियों कि सुबह में माँ से लड़ता कोहरा याद आता है.

सुबह की दौड़ती भागती ज़िन्दगी,
छोटो की फरमाइशें, औरों की उम्मीद,
छोटे बड़े मोजों की तलाश,
बुखार में तपती जान पर दुआओं का पहरा याद आता है.
--शुभी चंचल

ख़्याल...

आँख बंद करते ही एक ख़्याल मेरे मन को भेदता है,
एक हाथ, उसमें बन्दूक से निकली गोली,
मेरे किसी 'अपने' की तरफ बढ़ती है,
में आगे बढ़कर उस गोली को खुद में समेट लेती हूँ,
लाल रंग की फुहार से भीगकर,
डगमगा गई उसी जगह मैं,
आवाज़े सुनने में कम,
और नज़ारे फीके पड़ने लगे,
वो हाथ भी धुंधला जाता है,
मेरी आँखें मेरे 'अपने' पर है,
मगर वो अब भी अनजान है, मेरा 'अपना'
कि वो कितना 'अपना' है मेरे लिए,
आँख बंद करते ही एक ख़्याल मेरे मन को भेदता है।

--शुभी चंचल

Thursday, December 1, 2011

सिलसिले...

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते

शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी
पा बजोलां ही सहीं नाचते-गाते जाते

उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ से तो निभाते जाते

-अहमद फ़राज़...