Tuesday, May 24, 2016

हंसते-हंसते रोना सीखो...

स्वाभाविक है रोना... गले का रुंधना, दिल की तकलीफ, मन की कसक... सब कुछ स्वाभाविक है। मगर क्या सचमुच सभी के लिए इतना ही स्वाभाविक है।
रोने को कमज़ोरी से जोड़ा गया है, कमज़ोरी को औरतों से। औरतों को रोने की उपाधि दी गई है...। मर्द रोए तो उसे भी 'औरत' कहा जाता है।
कई मज़ाक सुने हैं इस पर...
औरतों की पलकों पर बाल्टी रखी होती है जब चाहती हैं थोड़ा सी लुढ़का कर काम बना लेती हैं।
अरे उनसे कुछ मत कहना वरना टेसुए बहा देंगी।
काम ही क्या है इनके पास, बस रो दें और इनकी बात मान ली जाएगी।
बस यही अच्छा नहीं लगता... हर बात पर रोना शुरू।
यार लड़कियों की तरह रोना मत शुरू कर देना।
रोना औरतों का काम है हम मर्दों का नहीं (फ़िल्म का डायलॉग)
और ऐसी न जाने कितनी बातें, ताने। हम हंसने, गुनगुनाने, मुस्कराने, उदास होने, प्यार करने, गुस्सा करने, चिढ़ने, जलने या किसी भी और एहसास पर इतना रिएक्ट नहीं करते। (वैसे महिलाओं के हर रिएक्शन पर हज़ारों टिप्पणियाँ हैं।)
इस पर कई शोध भी हुए हैं। माना जाता हैं उदास और दुःखी होने पर रो देने वाले मर्द बाकी मर्दों से ज़्यादा अच्छे इंसान होते हैं। ये भी कहा गया है कि रोना हमारी मानसिक सेहत के लिए अच्छा है और ज़रूरी भी।
हालांकि रोने के समय, जगह और साथ का भी अपना महत्व है। किसी अपने के सामने रोना और अजनबी से छिपकर रोना अलग-अलग एहसास देते हैं।

मुस्कराहट को किसी भी मर्ज़ के लिए सबसे अच्छी दवा और ख़ूबसूरती बढ़ाने के लिए सबसे बेहतर मेकअप माना गया है।
इसके साथ ये भी सच कि है दुःखी और उदास होने पर रो लेना दवा जैसा है और मन की ख़ूबसूरती के लिए उसका साफ़ होना ज़रूरी है जो रोने से हो सकता है।
इस पोस्ट का मतलब ये बिलकुल नहीं कि रोना ही हर समस्या का हल है। मगर रोना बुरा नहीं है और कभी कभी ज़रूरी है।

याद कीजिए पिछली बार कब रोए थे आप (खासकर पुरुष)। अगर ये वक़्त छह महीने से ज़्यादा हो चुका है तो...
खैर रोते हुए चेहरों को दुनिया या तो देखना नहीं चाहती या उस पर हंसती है। हंसते हुए चेहरों की मांग ज़्यादा है...

इसलिए मुस्कराते रहिए।

Thursday, April 23, 2015

सही नहीं है...

एक हार... बड़ी निराशा... खालीपन... गहरा आक्रोश और अगले दिन से नाउम्मीदी।

क्या यही वजह काफी नहीं है फांसी पर लटक जाने के लिए, तीन मंज़िला इमारत से कूद जाने के लिए? कलाई की नस काट लेने या खुद को घातक इंजेक्शन लगा लेने के लिए?
पिछले एक महीने में मेरे आसपास चार आत्महत्या की गईं।
(अब तक की खबर के मुताबिक)
पहला-नवीं क्लास के पहले दिन अपने स्कूल की छत से कूदकर राहुल ने जान दे दी। दीवार पर लिख गया 'वेटिंग फॉर यू जूलियट'। अपने पीछे छोड़ गया कई सवाल। मां-बाप और भाई चौराहों पर तख़्ती लेकर बैठे हैं कि मेरा बेटा ख़ुदकुशी नहीं कर सकता। अज्ञात छात्रों पर हत्या का आरोप भी लग गया।
दूसरा-मेरी ही सीनियर अंशु सचदेवा ने अपने घर में फांसी लगा ली। रोका की रस्म हो चुकी थी। होने वाले जीवनसाथी का साथ न होना वजह कही जा रही है। अंशु की बहन ने बताया कि आखिरी मैसेज अंशु ने अपने ब्वॉयफ्रेंड को किया था, 'आई एम गोइंग'।
तीसरा-एम्स की एक डॉक्टर ने खुद को घातक इंजेक्शन देकर ख़ुदकुशी कर ली क्योंकि उनका पति गे था। घटना के एक दिन पहले डॉक्टर ने अपनी फेसबुक वॉल पर पति के लिए प्यार को स्वीकार करते हुए अपने एहसास बांटे।
चौथा-'आप' की रैली में एक किसान ने हज़ारों लोगों के सामने अपनी जान दे दी और एक पर्ची में अपनी बर्बादी की दास्तान के साथ सवाल छोड़ गया कि इस बर्बादी के साथ मैं घर कैसे लौटूं...।
राहुल के मां-बाप दोनों काम करते हैं।एग्जाम के बाद वो अगली क्लास के पहले दिन स्कूल जा रहा होगा। जांच में उसके बैग से टिफिन, पानी की बोतल और एक केला निकला था। शायद घर से निकलते वक़्त मां ने कहा होगा टिफिन खतम करके आना और केला रास्ते में ही खा लेना। शायद मां मुस्कराई भी हो कि उनका बेटा 9वीं में चला गया...।
अंशु घटना वाले दिन अपनी बहन के घर से खाना खाकर आईं थीं। क्या अंशु को पता था कि ये उसका आखिरी कौर था...। शायद उस रात अंशु के पिता शादी के लिए वेन्यू सोच रहे हों।शायद मां साड़ियों की गिनती कर रही हो।

शायद के साथ लिखे वाक्य सिर्फ मेरी कोरी कल्पना है। सच में मैं सोचकर दंग रह जाती हूँ कि किस तरह का अवसाद पनपता होगा... कितनी तीव्र होती होगी मरकर मिट जाने की इच्छा... किस कदर आक्रोश से भरा हुआ मन सिर्फ एक वजह के लिए।
उस एक वजह में इंसान जोड़ लेता है कई और वजहें टूटी-फूटी भी।
एक डॉक्टर जिसने कई साल पढ़ाई करके डिग्री हासिल की। उसने जान दे दी क्योंकि उसका पति गे था?
एक लड़की जो खुद इतने अच्छे काम से जुड़ी थी उसने जान दे दी उस शख्स के लिए जिसने उसकी क़द्र ही नहीं की?
एक किसान झूल गया जिसके पास खेती करने का हुनर हमेशा रहने वाला था?
एक लड़का कूद गया जो अभी ज़िन्दगी की रेस में शामिल ही नहीं हुआ था?

सही नहीं है....।

अनुपम खेर ने एक शो में कहा था कि जब आपको लगे कि सब कुछ ख़त्म हो गया है... समझो वहीँ से एक नई शुरुआत है। क्योंकि अब और कुछ ख़त्म होने को बचा ही नहीं है। अब सिर्फ कुछ बन सकता है।

सच है कि ज्ञान देना आसान है... बातें करना आसान है पर सच ये भी है कि अगर ये बातें खुद से कर ली जाएं तो ख़ुदकुशी की नौबत न आए।
किसी ने स्टेटस लिखा था कि 'ऐसा क्या था जो वो कह न पाई, क्यों नहीं कहा और हम सिर्फ नाम के दोस्त साबित हुए...वगैरह वगैरह'।

मुझे लगता है हम खुद से कह नहीं पाते... खुद से बात नहीं कर पाते... किसी और के कहने से ज़्यादा सुकून तब मिल सकता है जब हम खुद से कहे कि क्या हुआ जो ये नहीं हो सका... रास्ते और भी हैं।
रात लम्बी सही पर सुबह तो आनी ही है।
उस सुबह का इंतज़ार ही अगर ज़िन्दगी बन जाए तो क्या बुरा है।

कोई तो होगा जिसे अब भी मेरी इस दुनिया में मौजूदगी चाहिए होगी।बिना मेरे स्टेटस पढ़े, बिना लाइक-कमेंट के...। बिना गुड मॉर्निंग मैसेज और दिन में चार कॉल किए.... कोई तो होगा जो मेरे बारे में कभी सोचता होगा। शायद किसी की दुआओं में अब भी मेरा ज़िक्र हो। मासूम दुआ के लिए ही सही क्या हम जी नहीं सकते? वो मां-बाप, भाई-बहन, कोई छूटा दोस्त, कोई रूठा साथी कोई भी हो सकता है।

आत्महत्या की खबर निराशा भरती है... मरता एक शख्स है और कई और को इस तरफ एक कदम और आगे बढ़ा देता है... कई लोगों को ज़िन्दगी की कीमत भी समझा देता है पर.....

सही नहीं है।

ज़रा सोचिए कोई एक तो होगा जो आपके चले जाने पर फूट-फूट कर रोएगा... जिसे आप कभी उदास भी नहीं देखना चाहते।चार मिनट के लिए सही... चार घण्टे के लिए सही...चार दिन के लिए सही... चार महीने के लिए सही। मत रुलाना उसे।
बस एक वजह ढूंढ लेना जीने के लिए।

किसी और से करें न करें... खुद से करिए... एक पूरी ज़िन्दगी है बतियाने के लिए।
ज़िन्दगी से बातें करिए।

आत्महत्या सही नहीं है।

Thursday, April 9, 2015

ज़रूरी है ज़रूरत...

वो जिससे अभी कुछ दिन पहले मुलाकात हुई। बात हुई। अचानक उससे इतनी नजदीकियां क्यों है? या वो जिससे कई साल का रिश्ता था... अचानक उससे फासले क्यों हैं? क्या है जो समय के साथ एक बच्चे और उसकी मां के बीच के प्यार को बदल देता है? और क्या है वो जो सबसे प्यारे दोस्त को बीते कल की एक कहानी बना देता है?
इन सवालों से कोई बचा रह गया है क्या? क्या कभी ऐसा सवाल आपके मन में नहीं आया?
आया है.... ज़रूर आया है और हर बार आपने बहाना बनाया है...। लोग बदल जाते हैं... हालात बदल जाते हैं... रिश्ते बदल जाते हैं। क्यों... इसी तरह समझाया है न खुद को।
मुझे लगता है कि बदलती है तो सिर्फ ज़रूरत।
ये ज़रूरत बड़ी चीज़ है। किसी भी रिश्ते के लिए ऑक्सीजन है। ये ख़त्म तो रिश्ता भी ख़त्म। खास बात ये है कि ऑक्सीजन की तरह ये भी एकदम से ख़त्म नहीं होती। धीरे-धीरे शुरू होकर धीरे-धीरे ही ख़त्म होती है।
कैसे जन्म लेता है कोई रिश्ता...?
खासकर वो रिश्ते जो हमें विरासत में नहीं मिलते।
एक ज़रूरत से....। ज़रूरत उस कान की जो सुने हमें। उन पैरों की जो साथ चले।
ज़िन्दगी के खालीपन को भरने की या जो कुछ भरा हुआ है मन में उसे निकालने की ज़रूरत।
जहां से ये ज़रूरत पूरी होती दिखी वहां बन गया रिश्ता। फिर....। फिर ज़रूरत पूरी हो गई।
जब कुछ पूरा हो जाता है तब वो अपनी अंतिम अवस्था में आ जाता है।
ज़रूरत पूरी यानी ख़त्म हो रही है। ये बात और है कि दो लोगों के बीच के रिश्ते में किसी की ज़रूरत पहले ख़त्म हो जाए और किसी की कुछ देर बाद। पर जब एक की ख़त्म हो जाती है तो ऑक्सीजन कम हो जाता है।
फिर दूसरे की ज़रूरत को ख़त्म होना पड़ता है।
.... चांद पूरा होने के बाद फिर शुरू होता है।
ज़रूरत ख़त्म होने के बाद फिर शुरू होती है... नए कलेवर में। फिर एक नए रिश्ते का जन्म।
.... लेकिन हम किसी और जाल में फंस जाते हैं। झगड़ते हैं.... तुम बदल गए... वो बदल गया... रिश्ता बदल गया। हालांकि ये भी बेहद ज़रूरी है।
सोचिए एक दिन आपका करीबी कहे.... यार देखो... मुझे लगता है ज़रूरत जो है न... वो ख़त्म हो रही है तो अब यहीं स्टॉप लगा लो।
अजीब लगेगा न सुनने में।
इतना प्रैक्टिकल चलेगा नहीं।
जब तक चार सेंटी शायरियां और तीन-चार रफ़ी साहब के गाने न सुन ले तब तक मज़ा कहां....।
खैर.... ज़रूरी है ज़रूरत .... बाकी बदलना तो सब कुछ ही है एक दिन।

Monday, March 30, 2015

अनजाना सफ़र...

मंज़िल साफ़ न हो तो रास्ते ज़्यादा ख़ूबसूरत हो जाते हैं...। मेरे अनजाने सफ़र ने यही सिखाया। हर रोज़ ऑफिस जाना और कभी स्टोरी के लिए वेन्यू तलाशना...। हर बार मंज़िल साफ़... उसी बोर्ड को तलाशती नज़र...।
मगर ये सफ़र कुछ अलग था... घर से निकलते वक़्त नहीं पता था कहां जाना है। चारबाग के लिए ऑटो में बैठकर सोचने की कोशिश की कि कहां जाया जाए पर दिमाग ब्लैंक।
चारबाग में ऑटो से उतरते ही 31 नम्बर बस दिखी...। लगा दी दौड़। उस वक़्त भी नहीं पता था जाना कहां है। बस उसी रास्ते पर बढ़ रही थी जिधर रोज़ जाना होता है पर ये क्या... आज कई नई होर्डिंग दिखी। कल तो नहीं थी... या थी और मुझे दिखी नहीं....। हवा तेज़ी से मेरे चेहरे को ठंडा कर रही थी। बस्स्स यही चाहिए था...। हां सच में हवा से चेहरा ही ठंडा करना था। ये क्या फुहारें भी पड़ने लगी...। बहुत धीमी। वो सड़क पार  सब्जी सजाकर बैठी औरत हाथों की उंगलियां मोड़ते हुए क्या सोच रही होगी? शायद फुहारें उसे डरा रही होंगी। अगर तेज़ हो गईं तो ये 10 किलो सब्जी कहाँ सजाएगी।
हां टिकट टिकट...
कहां जाना है? मेरे बगल वाली लड़की से कंडक्टर ने पुछा।
एमएसटी है।
इतनी देर में मैं समझ चुकी थी कि बस का लास्ट स्टॉपेज आईआईएम है।
मैंने बोला, आईआईएम।
पता नहीं क्यों कुछ अजीब लगा बोलने में। कहीं वो पूछ बैठे आईआईएम क्यों जाना है तो?
खैर आज हुसैनगंज चौराहा कुछ नया सा नहीं लग रहा...? और ये स्कूल रिक्शा चलाने वाले भईया जी...झुण्ड बनाकर क्या बतिया रहे हैं? शायद ये कि दो दिन बाद पहली तारीख़ आने वाली है। बर्लिंगटन आज ज़्यादा साफ़ दिख रहा है। विधानभवन से गुज़रते समय दिल्ली की वो सैर याद आ गई जब करुणा के साथ दिन भर का पास बनवाया था और हर बस स्टॉप पर हरी वाली बस का इंतज़ार किया था। आज बस इलाहबाद बैंक से मुड़ी नहीं... चलो रोज़ वाली सड़क ख़त्म हुई। मेरे बगल वाली सीट पर बार बार लड़की बदल जाती है... पता भी नहीं चलता। इस बार नेशनल कॉलेज की स्टूडेंट बैठी है। सामने किसी कॉलेज की लड़कियों का ग्रुप...। सब म्यूजिक पर बात कर रही है.... शकीरा से लेकर ए आर रहमान और अब पंजाबी गाने पर पहुंच गईं। दूसरे स्टॉप पर मेरे बगल बैठी स्टूडेंट की दोस्त भी चढ़ी। दो की सीट पर तीन एडजस्ट हो गए। फोन पर वो किसी को जगाने की कोशिश कर रही थी। 'कॉलेज जाना है... या आज भी गोला... चलो उठो'। अरे बस अलीगंज पहुंच गई। अगर इधर ही आना था तो बस क्यों पकड़ी...। अमीनाबाद से आते पर मुझे तो चेहरा ठंडा करना था न... बताया तो। अच्छा ये है आंचलिक विज्ञान नगरी...। यहां आना है। इंजीनियरिंग कॉलेज चौराहा आ गया। बस लगभग खाली हो चुकी है। हां याद आया... नुक्कड़ नाटक के लिए इधर से ही गए थे। सामने बोर्ड लगा है सीतापुर... दिल्ली... कहां जाना है? बस एकदम खाली हो गई। ड्राइवर, कंडक्टर और मैं। अनजाना सफ़र.... कुछ डर लगना तो वाज़िब है क्योंकि डर सबको लगता है, गला सबका सूखता है। कंडक्टर ने फिर पूछा जाना कहां है?
मैंने कहा, आईआईएम।
आईआईएम में कहां?
बस आईआईएम।
एक आश्रम है... वहां तो नहीं जाना?
हां हां वहीं जाना है। आश्रम जाना है।
ठीक है... यहीं उतर जाइए...। आगे गेट है... गेट से बाएं।
...........................
 पूरे सफ़र में यहां तक का सफ़र ही खास था....। पता है क्यों?
क्योंकि यहां तक का सफ़र ही अनजाना था...। अब तो लौटना होगा।
आईआईएम के गेट के अंदर जाते ही जेएनयू की याद आई। सामने दिखती लम्बी और सूनी सड़क। अगल-बगल पेड़। बीच-बीच में गुज़रती बाइक। मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी... अपने आप।
 आश्रम का गेट दिखा पर सामने दिख रही कहीं न ख़त्म होने वाली सड़क ज़्यादा रोमांचित कर रही थी। मेरे करीबी जानते हैं कि मैं पैदल ज़्यादा नहीं चलती... पर यहां दिल यही कर रहा था कि ये सड़क कभी ख़त्म न हो।
आगे लिखा था... प्रबंध नगर आपका स्वागत करता है।
आईआईएम आ गया। बड़ा सा गेट... अंदर जाने को मिलेगा... शायद नहीं। हमारे आईआईएमसी में तो कोई भी आ जाता है। सोचा यहीं से लौट चले पर सामने मोड़ के बाद न दिखने वाली सड़क ने अपनी तरफ खीँच लिया। आगे एक खुशबू थी... बिलकुल रुदौली जैसी। गोबर के कण्डे की... कच्चे दूध की... भूसे की.... खेतों की...। वाह यही तो है मेरे सपनों की जगह। हां चेहरा ठंडा करने के अलावा यही खुशबू ढूंढने तो निकले थे। मेरे पैरों में कोई थकान नहीं थी। ट्रैक्टर की फोटो खींचते समय कई लोग घूर रहे थे... पर मुझे घूरने पर बुरा नहीं लग रहा था। गांव के लोगों की आँखों में गन्दगी नहीं जिज्ञासा दिखती है। कौन है ये लड़की। अकेले यहां कैसे। फोटो क्यों खीँच रही है। ढेरों सवाल।
कुछ दूर और चलने के बाद मुझे लगा अब लौट जाना चाहिए क्योंकि मुझे आसानी से रास्ते याद नहीं होते...। लौटने के लिए मुड़ते वक़्त मुझे सफ़र के ख़त्म होने की कसक थी। क्योंकि सफ़र तो अभी बचा था पर अनजाना सफ़र ख़त्म हो रहा था। लौटकर मैंने आईआईएम देखा। अंदर जाने को नहीं मिला। वहां से आश्रम। आश्रम में झूला। रसोइये से बातचीत। नंगे पैर छलांग लगाती सोनम से थोड़ी गप्प। गायत्री परिवार के मंदिर में माइक पर चिल्लाते महानुभाव और फिर बैटरी वाली गाड़ी से वापसी। आगे का सफ़र... सफ़र था। अनजाना सफ़र नहीं।
लखनऊ की सड़कों पर मैंने पटना, जयपुर और अमृत सर की सड़कों को पाया। मेरे सारे सफ़र अनजाने सफ़र से जुड़ गए।
सफ़र में अकेला होना और अकेले सफ़र करना अलग बातें हैं। अकेले सफ़र करने में जितनी नई चीज़ें आप जान सकते हैं किसी के साथ होने पर नहीं। मैंने अपने सफ़र में बहुत कुछ नया जाना। खबरों में पढ़े जाने वाले कई स्कूलों के नाम... होर्डिंग में देखे।
बात वहीं ख़त्म होती है कि मंज़िल साफ़ न हो तो रास्ते ज़्यादा ख़ूबसूरत हो जाते हैं।
बाकी चलना ज़रूरी है। चलते रहिए।

Wednesday, May 1, 2013

ख़ामोशी...


दिन भर के बाद कमरे का एकाकीपन भी अच्छा है,
इस सन्नाटे में पंखा भी चुप ही अच्छा लगता है,
बेआवाज़ भाषा गूंजती है दीवारों में,
खुद को सुनता है शख्स, यादों और सपनों के साथ,
कई बार नींद को पटखनी भी देता है,
कई बार आंसू परेशां भी करते हैं,
मगर ये हिस्सा है उस एकाकीपन का, 
जो वो चाहता है दिनभर के बाद अपने कमरे में ...
- शुभी चंचल

Friday, February 15, 2013

गिद्धों का शिकार...

आने वाले तूफानों से अनजान,
फुदकती है वो घर के आँगन में,
हँसती है, हँसाती  है,
गूंजती है उसकी आवाज़,
मोहल्ले की आखिरी गली तक,
तूफान से पहले की आंधी आती है जब,
सहम तो जाती है वो,
मगर फिर खुद ही संभल भी जाती है,
दूर कहीं उठ रही लहरों को भाप नहीं पाती,
सीख लेती है ज़िन्दगी के हुनर कई,
अपने हुनर का लोहा भी मनवाती है,
मगर तूफान जो आना था, रुकता नहीं,
आता है वो अपने पूरे आवेग से,
दुनिया भर का गुस्सा लिए,
वो डर जाती है, सिकुड़ने सी लगती है
उसकी आवाज़ और बाहें एक साथ,
उसे है प्यार अपने पंखों से,
खुले नीले आसमान से,
मगर वो घिर चुकी है ...
फुदकने, हँसने, हंसाने वाली चिड़िया,
हो जाती है गिद्धों का शिकार ...
-शुभी चंचल


Monday, February 4, 2013

अच्छा लगता है...

मुझे अच्छा लगता है,
डोर से छूटी पतंग का खुद मुकाम चुनना 
शाम का वो ढलता-उदास सूरज,
मुझे अच्छी लगती है,
नल से गिरने वाली आखिरी धार,
दुकान में बची आखिरी किताब,
मुझे अच्छा लगता है,
बर्तन में बचा वो आखिरी कौर,
रजाई में लगा धागे का आखिरी टांका,
मुझे ये सब अच्छा लगता है,
क्योंकि ये सब ख़त्म हो रहे हैं,
अपनी आखिरी सांसों के साथ,
मुझे अच्छी लगती है, अपनी ख़ुशी, इच्छाएं और उम्मीद ...
-शुभी चंचल 

Saturday, December 8, 2012

... तो क्या बुरा है ???


वर्तिका नंदा मैम की कविताओं से प्रेरित और उन बेटियों, बहनों और पत्नियों को समर्पित जिनका जीवन पुरुषों के बनाये गए नियम कायदों पर चलता है ....



जोर से हँस लूं तो क्या बुरा है,
मैं भी मुस्कुरा लूं तो क्या बुरा है,
ज़िन्दगी में गम-आंसुओं की कमी तो नहीं,
एक दिन मगर सुस्ता लूं तो क्या बुरा है ....

एक आस कर लूं पूरी,
भुला दूं अपनी मजबूरी,
तेज़ आवाज़ में बोल दूं तो,
एक दिन मेज पर चढ़कर गुनगुना लूं तो क्या बुरा है ...

ऊंची मंजिल पर चढ़कर देखूं शहर सारा,
झरोखे से देखूं सपना कोई प्यारा,
घर-बाहर के काम में बाबा को राय दूं तो,
एक दिन अपनी भी कह दूं तो क्या बुरा है ...

साइकिल चलाऊं खेतों में शबनम और पूजा के साथ,
न बनाऊं एक दिन चोखा-रोटी और दाल-भात,
मैं भी देर से घर आऊं तो,
एक दिन गलियां भूल जाऊं तो क्या बुरा है ...

देखूं अफसर बनने का सपना,
साथ दे जो कोई अपना,
मैं भी कोई रौब दिखाऊँ तो,
एक दिन मैं भी जी जाऊं तो क्या बुरा है ...

---शुभी चंचल 

Saturday, July 28, 2012

हाँ मगर देश बढ़ रहा है...

सब कुछ तो वैसा है प्यारे,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
बेटियां कोख में मरती हैं,
माँ ही क़त्ल करती है
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
बेटे को मिलता मौके पर मौका,
बेटियां चलाए चूल्हा चौका,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
अमीर का दस-दस मकान खड़ा है,
गरीब के छप्पर में छेद बड़ा है,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
बेटा लाएगा पैसा चार,
बेटी देखेगी घर बार,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
औरत शोभा चार दीवारी की,
ज़रुरत नहीं हिस्सेदारी की,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
फैसला होगा सब साहब जी का,
शक्कर तेज़ या नमक है फीका,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
लड़की के नाम है सीख का पर्चा,
लड़के पर बस पैसा खर्चा,
हाँ मगर देश बढ़ रहा है...
-- शुभी चंचल

Thursday, June 14, 2012

करुना के लिए


IIMC ने बहुत कुछ दिया..... जिसे गिना नहीं जा सकता.... उसमें से ही है कई अच्छे दोस्त...... उन दोस्तों में से एक .... करुना जी... उनके लिए लिखी गई ये कविता... उनसे बिछड़ते समय ....

वो आई और घुल गई ज़िन्दगी में,
जैसे रंग कोई घुल जाए पानी में,
बदल जाए पानी भी,
और बदला ही रहे,
अचानक आई धूप,
उड़ने लगा रंग भी, पानी भी,
उड़ रहा है धीरे-धीरे,
उड़ जाएगा सामने ही,
रह जायेंगे निशां बाकी,
उन निशानों के साथ यादें भी,
उन रंगीन पानी की तसवीरें.... और साथ,
पानी और रंग का....

- शुभी चंचल

Friday, April 27, 2012

पलटते कदम...


आठ महीने पहले दिल्ली की तरफ बढ़े कदम आज पलट रहें है... फिर उन्ही गलियों में, उन्हीं रास्तों पर जहाँ से गुज़रते हुए अपनी मंज़िल तय की थी और उस मंज़िल को पाने का रास्ता दिल्ली माना था. कुदरत के किसी करिश्मे की तरह मेरा दिल्ली आना, आठ महीने पर्वत, जंगलों और तरह तरह के लोगों के बीच रहना और उनमें इतना रम जाना कि खुद को भूल जाना या शायद खुद के और करीब आ जाना ... ये सब ज़िन्दगी भर का किस्सा हो चला है... एक बड़े अख़बार की नौकरी के साथ एक बार फिर तहजीबों के शहर लखनऊ का रुख़ कर रही हूँ... इन आठ महीनों में इस अजनबी शहर ने बहुत कुछ दिया है और बदले में लिए है  मेरे कुछ भ्रम, मेरी अधपकी सोच और दुनियादारी की नासमझी... निखारे है मेरे अल्फाज़, मेरा लहज़ा और दिया है नया नज़रिया...
अब देखना है... ज़िन्दगी और क्या क्या रंग दिखाती है... अपने शहर में... क्यूंकि भले ही शहर वही है लेकिन अब तक वो मेरे लिए जन्मभूमि थी..और अब होगी कर्मभूमि.... शहर को और करीब से जानने का मौका मिल रहा है... अपनी नयी आँखों से...  
-शुभी चंचल 

Monday, April 23, 2012

...वो वक़्त वो घड़ियाँ


हर वक़्त याद आती है वो घड़ियाँ,
पर वो वक़्त वो घड़ियाँ अब नहीं रही,
जब जल्दी में भूलती थी कलम अपनी,
और लिखते समय बैग खंगालती थी,
जब चढ़ते हुए सीढ़ी खोजती थी एक चेहरा,
और दिखने पर मुस्कुरा देती थी,
हर वक़्त याद आती है वो घड़ियाँ,
पर वो वक़्त वो घड़ियाँ अब नहीं रही,
जब करती थी टन-टन घंटी का इंतज़ार,
फिर जल्दी से डिब्बे खाने के खोल देती थी,
जब खाली घंटे में भागती थी बतियाने को,
और वो सारे राज़ अपने बोल देती थी,
जब उनकी ख़ुशी के लिए दुआ में हाथ उठाते थे,
और रब से बात करते-करते रो देती थी,
हर वक़्त याद आती है वो घड़ियाँ,
पर वो वक़्त वो घड़ियाँ अब नहीं रही,
जब छुट्टी होना वक़्त होता था बिछड़ने का,
और दोस्त की हँसी ठेले से मोल लेती थी,
हर वक़्त याद आती है वो घड़ियाँ,
पर वो वक़्त वो घड़ियाँ अब नहीं रही...
-शुभी चंचल

Friday, April 20, 2012

ढलता हुआ सूरज...


ढलता हुआ सूरज देता है आवाज़ मुझे,
बुलाता है पास मेरे घोसले के,
कहता है दाना खाने को,
और मोड़ लेने पंखों को,
कुछ देर सो लेने को,
ख्वाब संजोने को,
जो कल करने है पूरे,
मेरी आँखें भी तलाशती है मेरे आशियानें को,
मगर यूँ ही, जाने क्या,
रोकता है मुझे, मेरे पंखों को,
मेरे साथ उड़ने वाले परिंदे शायद,
खुला नीला आसमां शायद,
बाहें फैलाकर सांसों का समाना शायद,
जो डरने नही देता मुझे,
ढलते सूरज से, बढ़ते अँधेरे से,
फिर भी ढलता हुआ सूरज देता है आवाज़ मुझे,
बुलाता है पास मेरे घोसले के...
-शुभी चंचल 


Sunday, April 8, 2012

आदत आठ महीनों की...

छूट जाएगी धीरे-धीरे, आदत आठ महीनों की,

चार कदम पर कॉलेज जाना,
चार कदम पर आशियाना,
लंच टाइम पर वापस आना,
खाने में कमी नमकीनों की,
छूट जाएगी धीरे-धीरे, आदत आठ महीनों की,

क्लास में जाकर झपकी लेना,
पर्चियों का वो लेना देना,
वहां भी जाकर कविता लिखना,
क्लास के उन ग़मगीनों की,
छूट जाएगी धीरे-धीरे, आदत आठ महीनों की,



१२ नंबर कमरे की,
आधी रात में खटखट की,
हर शाम भीड़ सी लगना वो,
हर बज़्म के हमनशीनों की,
छूट जाएगी धीरे-धीरे, आदत आठ महीनों की,

वो शाम में पेट के चूहों की,
वो दौड़ जंगल की राहों पे,
डर समोसे की गिनती का,
वो दहिया जैसी कैंटीनों की,
छूट जाएगी धीरे-धीरे, आदत आठ महीनों की...

-
शुभी चंचल